दो दिवसीय सांतू आंठू के पर्व का धूमधाम से समापन
गौरा-महेश्वर के जन्म और विवाह की गाथा
इस पर्व के दौरान महिलाएं जो पारंपरिक लोकगीत और गाथाएं गाती हैं, उनमें भगवान शिव और पार्वती के प्राकृतिक स्वरूप तथा विवाह का सुंदर वर्णन किया जाता है।

इस दिन महिलाएं उपवास रखकर पंडित के द्वारा वैदिक मंत्रोचार करके जो महिलाओं द्वारा मूर्ति बनाई गई है उसमें प्राण प्रतिष्ठा करके पूजा अर्चना कर माता गौरा और शिवजी से अपने परिवार के कल्याण के लिए प्रार्थना करती है और पारंपरिक लोक कथाएं भजन कीर्तन करके आशीर्वाद मांगते हैं

लोक मान्यता के अनुसार, (महेश्वर/शिव) का जन्म ऊंचे पर्वतों के ठंडे शिखर पर हुआ और गौरा (पार्वती) का जन्म गंगा तट पर वट वृक्ष की छाया में हुआ।

मायके आगमन और विदाई: माना जाता है कि सप्तमी के दिन माता गौरा (पार्वती) ससुराल से रूठकर या अपने मायके (हिमालय/पहाड़) आती हैं। अष्टमी को महेश्वर (शिव जी) उन्हें मनाने और लेने के लिए ससुराल पहुँचते हैं। इसलिए इस पर्व में दोनों की धान और सौं घास से मानव-रूपी प्रतिमाएं बनाकर उनका विवाह व मिलन कराया जाता है, तथा अंत में नम आँखों से बेटी-दामाद की तरह उन्हें विदा किया जाता है।

‘बिण भाट’ की लोककथा (दुबड़ा और बिरुड़ की कथा)
सातूं-आठूं के दिन महिलाएं व्रत रखकर जो सबसे मुख्य पौराणिक लोककथा सुनती हैं, उसे ‘बिण भाट की कथा’ यह कथा संतान सुख और अखंड सौभाग्य से जुड़ी है:

निःसंतानता और व्रत का बर्णन: प्राचीन समय में बिण भाट नाम का एक राजा या व्यक्ति था। उसकी सात रानियाँ थीं, लेकिन लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई। दुखी होकर उसने एक पंडित/ऋषि से उपाय पूछा। पंडित जी ने उसे भाद्रपद मास की पंचमी को ‘बिरुड़’ (पांच अनाज) भिगोने, सप्तमी को गौरा और अष्टमी को दूर्वा (दूब/घास) से महेश्वर की पूजा करने तथा दूर्वाष्टमी का व्रत रखने की सलाह दी।


सौतों का षड्यंत्र: कालांतर में राजा की सबसे छोटी रानी गर्भवती हुई। राजा को उससे विशेष प्रेम था, जिससे बाकी छह रानियों में ईर्ष्या जाग उठी। जब छोटी रानी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया, तो ईर्ष्यालु रानियों ने छल किया। उन्होंने रानी को झूठ बोला कि उसकी माँ बहुत बीमार है और उसे तुरंत बुला रही है। रानी जैसे ही गई, उन्होंने नवजात शिशु को एक बावड़ी (नौले) में फेंक दिया और लौटने पर रानी से कहा कि उसने संतान नहीं बल्कि एक शिलाखंड (पत्थर) को जन्म दिया है।
दूर्वाष्टमी का चमत्कार: जब रानी नौले (जल स्रोत) पर पानी भरने गई, तो उसने देखा कि दूर्वा (दूब घास) और सातूं-आठूं के व्रत के प्रभाव से उसका बालक जीवित था और सुरक्षित क्रीड़ा कर रहा था। इस चमत्कार के बाद रानी को अपनी सौतों के षड्यंत्र का पता चला। उसने बालक को गले लगाया और महेश्वर व गौरा माता का आभार व्यक्त किया।
धार्मिक मान्यता:
इसी दंतकथा के कारण कुमाऊँ की महिलाएँ अपने बच्चों की दीर्घायु, निरोगी काया और वंश वृद्धि के लिए इस दिन दूर्वाष्टमी (आठूं) का व्रत रखती हैं। पूजा के दौरान हाथ में ‘डोर’ और गले में ‘दुबड़ा’ (पवित्र धागा) धारण किया जाता है तथा यह कथा सुनकर एक-दूसरे को आशीर्वाद दिया जाता है।


