उत्तराखंड के उपनल कर्मियों के लिए बड़ा आदेश: 1 नवंबर से विभागीय संविदा पर मिलेगा मानदेय

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उत्तराखंड के विभिन्न विभागों और कार्यालयों में बरसों से अपनी सेवाएं दे रहे हजारों उपनल (UPNL) कर्मियों के लिए वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर एक बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। कोषागार, पेंशन एवं हकदारी निदेशालय द्वारा जारी एक नए आदेश के तहत सभी कोषाधिकारियों और आहरण-वितरण अधिकारियों (DDOs) को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि उपनल कर्मियों को विभागीय संविदा के दायरे में लाया जाए। इसके साथ ही ‘मानक मद 16-पूर्व उपनल कार्मिक समान कार्य वेतन’ के तहत 1 नवंबर 2026 तक हर हाल में मानदेय का भुगतान सुनिश्चित करने को कहा गया है। यह आदेश उन तमाम कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर है जो लंबे समय से अपने वेतन और वित्तीय सुरक्षा को लेकर संघर्ष कर रहे थे। नक्शेदेखें

नियमितीकरण लटका रहने से संगठनों में गहरी नाराजगी
इस नियमितीकरण लटका रहने से उनल कर्मचारियों और उनके संगठनों में गहरी नाराजगी और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। जानकारों का कहना है कि सरकार की तरफ से कोर्ट में लगातार समय खींचा जा रहा है, और पिछले चार-पांच महीनों से मामले को टाला जा रहा है। स्थिति यह है कि सॉलिसिटर जनरल तक को अवमानना के मामलों में कोर्ट के सामने खड़ा होना पड़ रहा है। लेकिन जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं, सरकार सक्रिय नजर आती है और आनन-फानन में कमेटियों का गठन कर दिया जाता है, या फिर अधिसंख्य पदों के सृजन की बातें होने लगती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार को चुनाव के वक्त ही सब कुछ दिखाई देता है, जबकि जमीनी हकीकत और कर्मचारियों का वास्तविक समाधान आज भी फाइलों में उलझा हुआ है। वोटरगाइड देखें

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कमेटी के गठन से भी नाराज हैं उपनल कर्मचारी
जनहित याचिका संख्या 116/2018 (“कुन्दन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य”) में नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में शासन के सैनिक कल्याण अनुभाग द्वारा 30 अक्टूबर 2026 को एक आदेश जारी कर अधिसंख्य पदों के सृजन पर निर्णय लेने के लिए अपर सचिव कार्मिक की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है, जिसमें वित्त, न्याय और सैनिक कल्याण विभाग के अपर सचिवों को शामिल किया गया है। उपनल कर्मचारी संगठन का कहना है कि कोर्ट के सामने अवमानना से बचने के लिए आदेशों के पालन की बात तो की जाती है, लेकिन अगर उक्त आदेश के पैरा 20 को देखा जाए, तो उसमें यह बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से कही गई है कि ये कर्मचारी सीधे तौर पर संबंधित विभागों के ही हैं, और उपनल केवल एक बिचौलिए की भूमिका निभा रहा है। यह व्यवस्था और बीच की कड़ियां सिर्फ वेतन भुगतान और नियमितीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए बनाई गई प्रतीत होती हैं। नक्शेदेखें

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नियमितीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए
जैसे ही इस पर्दे को हटाया जाएगा, यह साफ हो जाएगा कि सभी कर्मचारी सीधे तौर पर विभाग के अधीन हैं। इसी आधार पर कर्मचारियों के पक्ष में मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण बातें उभरकर सामने आती हैं। पहला, समय-समय पर प्रचलित नियमावली के अनुसार नियमितीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए; दूसरा, वर्तमान में वर्ष 2013 की नियमावली प्रचलित है जिसके तहत कर्मचारियों का स्पष्ट स्टेटस संविदा का है; और तीसरा, जब नियम और पुराने आदेश पहले से मौजूद हैं, तो बार-बार समय मांगकर कर्मचारियों के भविष्य के साथ छलावा क्यों किया जा रहा है?

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कमेटी-कमेटी न खेले पहले के आदेशों का पालन करे सरकार
कर्मचारी संगठनों का यह भी कहना है कि नई कमेटियों के गठन और कागजी बैठकों के बजाय सबसे पहले पूर्व में पारित आदेशों का जमीन पर पालन शुरू किया जाना चाहिए। उपनल के जरिए वर्षों से अपनी जवानी और मेहनत खपा रहे इन कर्मियों का दर्द अब छलकने लगा है। देखना यह होगा कि 1 नवंबर 2026 की समयसीमा के भीतर कोषागार स्तर से होने वाला यह मानदेय भुगतान कागजों से निकलकर जमीनी स्तर पर कितना कारगर साबित होता है और क्या सरकार इन कर्मियों को उनका वास्तविक और स्थायी हक दिला पाएगी या यह सिर्फ एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगी

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