मोदी सरकार द्वारा श्रम संहिताओं को लेकर फैलाया गया झूठ देशभर में मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों से हुआ पूरी तरह बेनकाब : माले

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  • भाकपा माले मजदूरों पर की जा रही दमनकारी कार्यवाहियों की कड़ी निंदा करती है

मोदी सरकार द्वारा श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को लेकर फैलाया गया झूठा प्रचार देशभर में मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों से पूरी तरह बेनकाब हो चुका है. देशभर में मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों में आई तेजी ने ट्रेड यूनियनों की लंबे समय से लंबित मांगों को रेखांकित किया है, जिनमें वेतन वृद्धि, सभी मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवरेज और सबसे महत्वपूर्ण—मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को वापस लेना शामिल है, जिनका लागू होना श्रम अधिकारों के पूर्ण हनन का कारण बनेगा।

मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद मजदूरों के लिए बेहतर जीवन का वादा किया था। इसके विपरीत, पानीपत से मानेसर और नोएडा तक के विरोध प्रदर्शनों ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि विभिन्न क्षेत्रों के मजदूर 12 घंटे के कार्यदिवस को अस्वीकार करते हैं, जो श्रम संहिताओं द्वारा लाया जाने वाला एक प्रमुख मजदूर-विरोधी बदलाव है। अप्रैल 2026 के आगमन के साथ—देशभर में वेतन वृद्धि, ओवरटाइम के लिए दोगुना भुगतान, शोषणकारी ठेका प्रणाली और अन्य मुद्दों पर हुए अधिकांशतः स्वतःस्फूर्त प्रदर्शनों से प्रेरित होकर मजदूरों ने सामूहिक संघर्ष के माध्यम से अपने अधिकारों की रक्षा करने का निर्णय लिया।

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वास्तव में, मोदी सरकार के वादों से इन मजदूरों का पूर्ण मोहभंग और नियोक्ताओं के मुनाफे की असीमित लालसा ही दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में व्यापक आक्रोशपूर्ण प्रदर्शनों का कारण बनी है। पिछले कुछ महीनों में मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों की लहर ने देश को अपनी चपेट में ले लिया है—जो पानीपत, सूरत, सिंगरौली और मानेसर, नोएडा और ग्रेटर नोएडा तक फैल चुकी है और अब पूरे देश का मजदूर वर्ग आंदोलन के लिये कमर कस रहा है.

एलपीजी और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ ‘भुखमरी स्तर’ के वेतन ने कई कारखानों में मजदूरों के स्वतःस्फूर्त प्रदर्शनों को जन्म दिया है. यह महत्वपूर्ण है कि ये अधिकतर कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत ठेका आधारित और असंगठित मजदूर हैं, जिन्हें मात्र 10-12 हजार रुपये का अल्प वेतन मिलता है और जो अब हड़तालों का सहारा लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं।

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ईएसआई, पीएफ, बोनस और ओवरटाइम भुगतान से वंचित किए जाने के कारण लंबे समय से इनका असंतोष स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, जबकि उत्तर प्रदेश और हरियाणा की राज्य सरकारें खुले तौर पर कॉरपोरेट कंपनियों के हितों की रक्षा कर रही हैं। अब आक्रोशित मजदूर आक्रामक और स्वतःस्फूर्त रूप से संघर्ष में उतर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और श्रम मंत्री ने जानबूझकर इन प्रदर्शनों को ‘बड़ी साजिश’ का हिस्सा बताने की कोशिश की है। योगी सरकार के अधीन बदनाम हो चुकी राज्य पुलिस को ‘साजिश के कोण’ की जांच का जिम्मा सौंपा गया है।

भाकपा माले इन दमनकारी कार्रवाइयों और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं श्रम मंत्री के बयानों की कड़ी निंदा करती है। हम मांग करते हैं कि मुख्यमंत्री और श्रम मंत्री ऐसे दुर्भावनापूर्ण बयान वापस लें और देश के मजदूर वर्ग से माफी मांगें।

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भाकपा माले मांग करती हैं:

  • उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकारें सभी गिरफ्तार मजदूरों और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा करें। ट्रेड यूनियन नेताओं की नजरबंदी और लगातार उत्पीड़न को तुरंत बंद किया जाए।
  • मजदूरों की जायज मांगों को उठाने पर उनके खिलाफ हो रही कार्रवाई को तुरंत रोका जाए।
  • सभी मजदूरों को प्रति माह कम से कम 42,000 रुपये का वेतन दिया जाए।
  • अवैध 12 घंटे के कार्यदिवस की व्यवस्था समाप्त की जाए।
  • ओवरटाइम कार्य के लिए दोगुना वेतन सुनिश्चित किया जाए।
  • शोषणकारी ठेका श्रम6 प्रणाली को समाप्त कर सभी ठेका और अस्थायी मजदूरों को नियमित किया जाए।

यह आंदोलन केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे इन मुद्दों का शीघ्र समाधान करें। भाकपा माले मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र समेत पूरे देश के संघर्षरत मजदूरों के साथ मजबूती से खड़ी है।

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