हल्द्वानी रेलवे भूमि मामला: सुप्रीम कोर्ट का जमीन खाली कराने का आदेश, पुनर्वास नीति के तहत मिलेगा आवास

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हल्द्वानी में रेलवे परियोजना को लेकर लंबे समय से चल रहे भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बसे लोग उसी स्थान पर बने रहने की मांग नहीं कर सकते। उन्हें सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उपलब्ध कराई जाने वाली वैकल्पिक जगह पर जाना होगा।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत मकान के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि रमजान समाप्त होने के बाद, 19 मार्च के पश्चात क्षेत्र में आवेदन जमा करने के लिए विशेष कैंप लगाए जाएंगे। किस परिवार को आवास के लिए पात्र माना जाएगा, इसका निर्णय नैनीताल के जिलाधिकारी (डीएम) करेंगे।

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रेलवे का पक्ष
रेलवे का कहना है कि वह करीब 30 हेक्टेयर भूमि पर अपनी सुविधाओं का विस्तार करना चाहता है। हल्द्वानी को उत्तराखंड का प्रवेश द्वार बताते हुए रेलवे ने स्टेशन के विस्तार, अन्य विकास कार्यों और नदी कटाव से ट्रैक को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की आवश्यकता जताई है। रेलवे का तर्क है कि जमीन पर अवैध कब्जों के कारण परियोजना का कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

बस्तीवासियों का दावा
दूसरी ओर, गफूर बस्ती के निवासियों का कहना है कि कई परिवारों के पास जमीन के वैध पट्टे हैं और उन्हें वहां से नहीं हटाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि विवादित क्षेत्र की कुछ जमीन रेलवे की है, जबकि कुछ राज्य सरकार की। राज्य सरकार ने परियोजना के लिए जमीन उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है।

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सरकार ने कोर्ट को बताया कि अधिकतर लोग अवैध रूप से रह रहे हैं। जिनके पास वैध पट्टा है, उनकी जमीन का मुआवजा देकर अधिग्रहण किया जाएगा और बाद में रेलवे को सौंपा जाएगा।

कितने लोग होंगे प्रभावित?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में 5 हजार से अधिक परिवार और लगभग 27 हजार लोग रहते हैं। हालांकि याचिकाकर्ताओं का दावा है कि प्रभावितों की संख्या करीब 50 हजार तक हो सकती है।

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पृष्ठभूमि
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पहले रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। 5 जनवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। उस समय कोर्ट ने कहा था कि हजारों लोगों को अर्धसैनिक बलों की मदद से एक सप्ताह के भीतर हटाना उचित नहीं है और पुनर्वास पर विचार आवश्यक है।

अब मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी।

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