
ईडी की कार्रवाई के बाद नैतिक जिम्मेदारी का हवाला देकर छोड़े संगठनात्मक पद, राहुल गांधी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का दिया तर्क, गोदियाल बोले—जिस मामले को लेकर घेरा जा रहा है, उस पर रावत 10 साल पहले ही कार्रवाई कर चुके हैं!
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में अचानक आए एक बड़े घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर हलचल तेज कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने पार्टी के संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। इंटरनेट मीडिया के जरिए सामने आए उनके इस फैसले ने न केवल कांग्रेस के भीतर नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया है, बल्कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की रणनीति और नेतृत्व को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
हरीश रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य और दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति यानी सीडब्ल्यूसी के सदस्य पद से त्यागपत्र देने की घोषणा की है। उनके इस फैसले को सीधे तौर पर हालिया प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई से जोड़कर देखा जा रहा है। रावत के पूर्व विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) के घर ईडी की छापेमारी और नकदी बरामदगी से जुड़े विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री का यह कदम राजनीतिक रूप से खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
‘भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए’
रावत ने अपने इस्तीफे के पीछे नैतिक और सैद्धांतिक आधार को प्रमुखता दी है। उनका कहना है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व, विशेष रूप से राहुल गांधी, भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में पार्टी के किसी नेता अथवा पदाधिकारी से जुड़े विवाद का असर कांग्रेस की इस बड़ी राजनीतिक लड़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए।
यही तर्क देते हुए रावत ने संगठनात्मक जिम्मेदारियों से अलग होने का निर्णय लिया है। हालांकि उन्होंने पार्टी छोड़ने की बात नहीं कही है। यही वजह है कि उनके इस्तीफे को फिलहाल कांग्रेस से दूरी बनाने के बजाय नैतिक जिम्मेदारी लेकर संगठनात्मक पद छोड़ने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
गोदियाल का बचाव, सवालों के घेरे में विपक्ष की रणनीति!
हरीश रावत के इस्तीफे के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल खुलकर उनके बचाव में उतर आए हैं। गोदियाल का कहना है कि रावत को जिस मामले को लेकर घेरा जा रहा है, उस पर वह करीब दस साल पहले ही कठोर कार्रवाई कर चुके हैं।
गोदियाल का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस पर हमला बोलने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। ऐसे में कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ भाजपा के भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों का राजनीतिक जवाब देना और दूसरी तरफ अपने ही वरिष्ठ नेता से जुड़े विवाद को पार्टी की चुनावी रणनीति पर हावी होने से रोकना।
रावत का इस्तीफा या कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक परीक्षा?
हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में महज एक नेता नहीं, बल्कि पार्टी के सबसे प्रभावशाली और अनुभवी चेहरों में शामिल हैं। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय राजनीति तक उनका लंबा अनुभव रहा है। ऐसे में संगठनात्मक पदों से उनका इस्तीफा सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना जा सकता।
खास बात यह है कि उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव करीब आते ही कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, चेहरे और रणनीति को लेकर पहले से ही चर्चाएं तेज हैं। ऐसे समय में रावत का यह फैसला पार्टी के लिए असहज सवाल भी खड़े करता है।
क्या यह केवल नैतिक जिम्मेदारी का फैसला है?
या कांग्रेस के भीतर चल रही किसी बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल का संकेत?
क्या रावत आने वाले दिनों में भी संगठन से बाहर रहकर कांग्रेस की राजनीति में अपनी भूमिका निभाते रहेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस घटनाक्रम का असर 2027 की चुनावी बिसात पर पड़ेगा?
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती सिर्फ हरीश रावत के इस्तीफे को संभालने की नहीं है, बल्कि इस पूरे विवाद को भाजपा के हाथ में बड़ा राजनीतिक हथियार बनने से रोकने की भी है।
हरीश रावत ने संगठनात्मक पद छोड़े हैं, कांग्रेस नहीं। लेकिन उनके इस्तीफे ने उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में एक ऐसा सवाल जरूर छोड़ दिया है, जिसका जवाब आने वाले दिनों की सियासत देगी।


