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हल्दूचौड़ गौला गेट क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से जंगली जानवरों का ख़ासा आतंक बना हुआ है। बीते कल हाथियों के एक झुंड ने क्षेत्र में जमकर उत्पात मचाया, जिससे स्थानीय किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है।
मिली जानकारी के अनुसार, दुर्गा पालपुर परमा प्रकाश चंद्र गुरु रानी की दुकान थी जो लाल कुआं निवासी सुभाष चंद्र गुप्ता को किराए पर दी हुई थी जिसको आज हाथियों ने दुकान को पूरी तरह तोड़ डाला। और बड़े पैमाने पर खड़ी धान की फसल को रौंद कर बर्बाद कर दिया। किसानों का कहना है कि वे दिन-रात अपनी फसलों की रक्षा के लिए जागकर पहरा देने को मजबूर हैं। लेकिन इसके बावजूद हाथियों, सूअरों, नीलगायों और हिरनों द्वारा फसलों को लगातार नुकसान पहुँचाया जा रहा है। अब तो स्थिति इतनी भयानक हो गई है कि रात के समय फसलों का पहरा देने वाले किसानों की जान-माल का ख़तरा भी बढ़ गया है।
चिंताजनक बात यह है कि खेतों में न केवल हाथियों का पहरा है, बल्कि स्थानीय लोगों द्वारा गुलदार (तेंदुआ) को भी उसके दो शावकों के साथ क्षेत्र में विचरण करते हुए देखा गया है। इससे ग्रामीणों में दहशत और बढ़ गई है।
दूसरी तरफ बाघ की दस्तक
प्राप्त जानकारी के अनुसार हल्दूचौड़ परमा निवासी दया किशन उपाध्याय के लड़के अभय उपाध्याय बाइक से अपने घर को आ रहे थे रास्ते में परमा और जयराम की गली में सामने से बाघ के आने पर उनकी बाइक रपट गई जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। ग्रामीणों द्वारा बताया कि इधर गन्ने के खेत में बाघ के दो बच्चे हैं जब लोगों ने इसकी शिकायत वन विभाग से की तो वन विभाग ने यहां पर आकर मौका मुआयना किया लेकिन उन्होंने बाघ का रेस्क्यू करने का कोई उपाय नहीं किया। जबकि गांव के बीचों बीच बाघ के दो बच्चे होना बहुत दहशत का विषय है वन विभाग को चाहिए कि वह समय रहते बाघ का रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ दिया जाए।
क्षेत्र के किसानों का आरोप है कि वन विभाग को बार-बार सूचित किए जाने के बावजूद भी जंगली जानवरों के आतंक को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। चार साल पहले जंगली जानवरों को रोकने के लिए सोलर फेंसिंग के नाम पर बाड़ लगाई गई थी, लेकिन वह भी अब बैटरी के अभाव में निष्क्रिय पड़ी है, जिससे विभाग की लापरवाही साफ़ नज़र आती है।
स्थानीय ग्रामीणों और किसानों ने वन विभाग के अधिकारियों से विनम्र अनुरोध किया है कि क्षेत्र में तत्काल गश्त बढ़ाई जाए और जंगली जानवरों को रोकने के लिए कोई ठोस और स्थायी कदम उठाए जाएँ, ताकि उनके जीवन और फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।


