
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. विद्यासागर नौटियाल की याद में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘विद्यासागर नौटियाल स्मृति साहित्य सम्मान’ साल 2026 के लिए दून घाटी के दो जाने-माने वरिष्ठ कथाकारों गुरुदीप खुराना और मदन शर्मा को संयुक्त रूप से दिया जाएगा। सम्मान चयन समिति के सदस्य और वरिष्ठ हिंदी कवि राजेश सकलानी और ‘सेव हिमालय मूवमेंट’ के समीर रतूड़ी ने इसकी जानकारी दी।
समीर रतूड़ी ने कहा कि यह एक बेहद ऐतिहासिक और सुखद संयोग है कि दोनों ही लेखकों का बचपन भारत के बंटवारे की भयानक त्रासदी से गुजरा था। बंटवारे के बाद दोनों दून घाटी पहुंचे और यहां बस गए। दोनों ही लेखकों ने अपनी पूरी जिंदगी बिना किसी शोर-शराबे के खामोशी के साथ धर्मनिरपेक्ष, मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों को केंद्र में रखकर लगातार लिखा है। साठ सालों से भी ज्यादा की इस लंबी अदबी यात्रा में खामोशी से किया गया यह रचनात्मक काम ही उनकी सबसे बड़ी ताकत और उपलब्धि है।
29 सितंबर को शाम 5 बजे होगा भव्य समारोह
सम्मान समारोह का आयोजन 29 सितंबर 2026 की शाम 5 बजे, देहरादून के सर्वे चौक स्थित आई.आर.डी.टी. (IRDT) ऑडिटोरियम में किया जाएगा। इस आयोजन की जिम्मेदारी ‘सेव हिमालय मूवमेंट’ संगठन संभाल रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देश के मशहूर कवि और वरिष्ठ पत्रकार विष्णु नागर होंगे। वहीं, मुख्य वक्ता के तौर पर जानी-मानी कथा आलोचक डॉ. रश्मि रावत शिरकत करेंगी। पूरे कार्यक्रम का मंच संचालन असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कामिनी रावत करेंगी।
इस खास मौके पर सुपरिचित पत्रकार और लेखक राजीव नयन बहुगुणा की नई-नवेली किताब “काजल कोठा” का लोकार्पण किया जाएगा। इसके साथ ही साहित्य की मशहूर पत्रिका “बनास जन” के विद्यासागर नौटियाल पर केंद्रित विशेष अंक (विशेषांक) को भी जारी किया जाएगा। इस ऐतिहासिक पल के गवाह बनने के लिए “बनास जन” पत्रिका के संपादक पल्लव भी विशेष रूप से मौजूद रहेंगे।
मदन शर्मा: त्रासद अतीत से निकली संवेदनशील कलम
मदन शर्मा का जन्म 5 जुलाई 1936 को मलेरकोटला (अब पाकिस्तानी पंजाब में) हुआ था। देश के बंटवारे के दौरान उनके दो भाई पेशावर से भारत आते वक्त शहीद हो गए थे। भारत आने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और भारत सरकार के रक्षा संस्थान (रक्षा मंत्रालय) में सेवा दी, जहां से वे जुलाई 1994 में सेवानिवृत्त हुए।
मदन शर्मा की लेखनी में जिंदगी के गहरे अनुभव और संवेदनाएं साफ झलकती हैं। उनके प्रमुख उपन्यासों में शीत लहर, अंधकार और प्रकाश, विदाई, वायलिन, सहमा हुआ आदमी, अब और नहीं, प्रतिक्रिया और बीच का आदमी शामिल हैं। उनके कथा संग्रहों में अनुभव और अंत से पूर्व प्रमुख हैं। इसके अलावा उन्होंने आत्मकथा उन दिनों और संस्मरण चन्द मुलाकातें भी लिखी हैं। राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी 500 से ज्यादा कहानियां, व्यंग्य, लघुकथाएं और एकांकी प्रकाशित हो चुके हैं।
गुरुदीप खुराना: जिंदगी और इंसानी जद्दोजहद के चितेरे
गुरुदीप खुराना का जन्म 24 सितंबर 1939 को क्वेटा (बलूचिस्तान) में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत आ गया। उन्होंने गणित और अर्थशास्त्र (Maths & Economics) में एम.ए. की डिग्री हासिल की और फिर तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) में अपनी सेवाएं दीं, जहां से वे रिटायर हुए।
गुरुदीप खुराना ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में बेहतरीन काम किया है। उनके काव्य संग्रहों में जिस जगह खड़ा हूं मैं और दिन का कटना शामिल हैं। उनके बहुचर्चित उपन्यासों में आओ धूप (1983), लहरों के पास (1997), बागडोर (2001), उजाले अपने अपने (2004), रोशनी में छिपे अंधेरे (2014) और आगे का रास्ता (2023) प्रमुख हैं। उनके कहानी संग्रहों में उलटे घर (1999) और एक सपने की भूमिका (2012) तथा संस्मरण इतना ही सही (2016) शामिल हैं।
पुरस्कार का गौरवशाली इतिहास
विद्यासागर नौटियाल की याद में शुरू किए गए इस सम्मान की शुरुआत साल 2021 में हुई थी। पहला सम्मान वरिष्ठ कथाकार सुभाष पंत को दिया गया था। साल 2022 में यह सम्मान स्वर्गीय शेखर जोशी को, 2023 में डॉ. शोभाराम शर्मा को और 2024 में मशहूर उपन्यासकार पंकज बिष्ट को प्रदान किया गया था। साल 2025 में यह सम्मान साहित्यिक क्षेत्र में नहीं दिया गया। इसके बजाय उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता प्रभात ध्यानी को समाज सेवा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दिया गया था।
उत्तराखंडसमाचार सदस्यता
कौन थे विद्यासागर नौटियाल
टिहरी गढ़वाल के मालीदेवल गांव में जन्मे विद्यासागर नौटियाल (1933–2012) हिंदी साहित्य और उत्तराखंड के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास के एक ऐसे स्तंभ थे। वे केवल एक लेखक ही नहीं, बल्कि एक जुझारू स्वतंत्रता सेनानी और जन-नेता भी थे। उन्होंने टिहरी रियासत की राजशाही के खिलाफ चले ऐतिहासिक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और जेल भी गए। बाद में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के देवप्रयाग से विधायक चुने गए । वह जीवन भर वामपंथी धारा से जुड़कर किसान-मजदूरों के अधिकारों की आवाज उठाते रहे। साहित्य के क्षेत्र में नौटियाल ने उत्तराखंड की पहाड़ी जिंदगी, वहां की विषमताओं, संघर्षों और लोक-संस्कृति को बेहद जीवंत रूप में उकेरा। ‘टिहरी की कहानियां’ उनका प्रसिद्ध कथा संग्रह है। उनके उपन्यासों में ‘सूरज सबका है, ‘उत्तर बायां है’, ‘यमुना के बागी बेटे’, ‘झुंड से बिछुड़ा’, ‘भीम अकेला’ और पुस्तक ‘मोहन गाता जाएगा’ आदि बेहद चर्चित रहे। उन्होंने समाज के शोषित और हाशिए पर खड़े लोगों की पीड़ा को गहरी मानवीय संवेदना के साथ अभिव्यक्ति दी।विद्यासागर नौटियाल का साहित्य आज भी नई पीढ़ी को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और लोक-पक्ष में खड़े रहने की प्रेरणा देता है


