
देवीधुरा, चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले में हर वर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित होने वाली विश्वप्रसिद्ध देवीधुरा बग्वाल को लेकर श्री वाराही शक्तिपीठ न्यास ने श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण अपील जारी की है। न्यास ने स्पष्ट किया है कि बग्वाल महज कोई पारंपरिक खेल या रोमांच का आयोजन नहीं, बल्कि चार खाम और सात थोक की गहरी धार्मिक आस्था से जुड़ा अनुष्ठान है। इसलिए इसमें केवल अधिकृत और परंपरागत रूप से जुड़े लोगों को ही सहभागिता करनी चाहिए।
धार्मिक आस्था से जुड़ा है बग्वाल
श्री वाराही शक्तिपीठ न्यास के अध्यक्ष हीरा बल्लभ जोशी ने कहा कि बग्वाल में शामिल होने वाले पारंपरिक सहभागियों को ‘द्योक’ यानी देवता के लोग माना जाता है। देवी के डोले को कंधे पर उठाने वालों से लेकर पुजारी, डंगरिया, जगरिया, ढोल वादक और हुड़का वादक तक सभी की अपनी धार्मिक भूमिका है।
स्थानीय लोगों के लिए इन परंपराओं में सहभागिता केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूजा और साधना का हिस्सा मानी जाती है।
सात्विक भोजन और धार्मिक अनुशासन का पालन
न्यास के अनुसार बग्वाल में शामिल होने वाले पारंपरिक सहभागी आयोजन से पहले सात्विक भोजन, व्रत और शुद्ध दिनचर्या का पालन करते हैं। बलि, बग्वाल, डोली और जमानि जैसी परंपराओं में उनकी सहभागिता धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है।
ऐसे में बिना पारंपरिक अधिकार या धार्मिक अनुशासन के बग्वाल में उतरना उचित नहीं माना जाता।
खोलीखांड मैदान से दूरी बनाए रखें बाहरी लोग
न्यास अध्यक्ष ने बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों से अपील की है कि वे बग्वाल को केवल कौतूहल या मनोरंजन का विषय न बनाएं। बग्वाल के दौरान बचकाना व्यवहार, परिहास या अनधिकृत सहभागिता से बचने की अपील की गई है।
न्यास ने स्पष्ट कहा है कि जो लोग अधिकृत सहभागी नहीं हैं, वे खोलीखांड मैदान से दूरी बनाए रखें। इससे परंपरा की गरिमा के साथ-साथ आयोजन की व्यवस्था भी बनी रहेगी।
चार खामों से जुड़ी है ऐतिहासिक परंपरा
देवीधुरा की बग्वाल सदियों पुरानी लोक आस्था और धार्मिक परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। इसका आयोजन चार प्रमुख खामों—वालिक, लमगढ़िया, चमियाल और गहड़वाल—से जुड़े पारंपरिक सहभागियों के बीच होता है।
बग्वाल को लेकर कई ऐतिहासिक और लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। मान्यता है कि प्राचीन समय में यहां देवी को प्रसन्न करने के लिए नरबलि की परंपरा थी। बाद में एक वृद्ध महिला द्वारा अपने पोते की बलि देने से इनकार करने और देवी की तपस्या के बाद ऐसी व्यवस्था बनी जिसमें मानव बलि के स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से रक्त बहने की परंपरा शुरू हुई।
भक्ति और लोक संस्कृति का भी केंद्र है देवीधुरा मेला
देवीधुरा का अषाढ़ी मेला केवल बग्वाल के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह भक्ति, लोक आस्था और उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। मेले के दौरान चांचरी, झोड़ा, भगनौल और छपेली जैसे लोकगीत और लोकनृत्य भी आकर्षण का केंद्र रहते हैं, जिनमें देवी-देवताओं की आराधना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
परंपरा की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी
न्यास का कहना है कि देवीधुरा बग्वाल को देखने आने वाले लोगों को इसकी धार्मिक संवेदनशीलता और सदियों पुरानी परंपराओं का सम्मान करना चाहिए। यह आयोजन केवल भीड़ जुटाने या रोमांच देखने का अवसर नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की गहरी आस्था और धार्मिक विश्वास का हिस्सा है।
न्यास ने दो टूक कहा है कि आस्था के इस अनुष्ठान में अनुशासन और मर्यादा बनाए रखना जरूरी है। परंपरा के साथ खिलवाड़ या अनधिकृत सहभागिता से बचकर ही देवीधुरा बग्वाल की मूल भावना और गरिमा को सुरक्षित रखा जा सकता है।


