क्या है उत्तराखंड का हरेला पर्व?, जानिए इसके पीछे की साइंस Uttarakhand Harela Festival

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Uttarakhand Harela Festival: उत्तराखंड का प्रकृति से जुड़ाव काफी गहरा है। जिसकी झलक यहां के त्योहारों में साफ देखी जा सकती है। पेड़, पौधों, नदियों, नौलों, फूलों को यहां देवतुल्य मान कर उनकी पूजा की जाती है और इन्हीं प्रकृति से जुड़ी चीजों पर आधारित होते हैं यहां के लोकपर्व, जिनमें से एक है हरेला।

उत्तराखंड का लोक पर्व हरेला Uttarakhand Harela Festival

उत्तराखंड में हरेला साल में तीन बार मनाया जाता है पहला चैत मास में, दूसरा श्रावण मास में और तीसरा हरेला आश्विन मास में। उत्तराखंड में श्रावण मास के हरेले को अधिक महत्व दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये त्यौहार शिव को समर्पित है। श्रावण मास शिव का पसंदीदा महीना है। गर्मियों के बाद सीधे सावन शुरू होता है तो चारों तरफ हरियाली नजर आने लगती है। माना जाता है कि हरेला मनाने से घर में सुख समृद्धि और शांति आती है। हरेला अच्छी फसल का सूचक भी है और ये भी माना जाता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे कृषि में उतना ही फायदा होगा। 

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हरेला में क्या होता है?

हरेले के पर्व से 9 दिन पहले मक्का, गेहूं, उड़द, सरसों और भट जैसे 7 तरह के बीज छोटी टोकरी में बोए जाते हैं और इसमें रोज पानी डाला जाता है। कुछ दिनों में ही ये अंकुरित होकर पौधे बन जाते हैं, जिसे हरेला कहा जाता है। इन पौधों को दसवें दिन काटकर घर के बुजुर्ग और देवताओं को अर्पित करते हैं। जिसके बाद बाकी परिवार के सदस्यों के कान और सिर पर इनके तिनकों को रखकर आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान बड़े बुजुर्ग गाते है:-

जी रया, जागि रया ,
यो दिन बार, भेटनें रया,
दुबक जस जड़ हैजो,
पात जस पौल हैजो,
स्यालक जस त्राण हैजो,
हिमालय में ह्यू छन तक,
गंगा में पाणी छन तक,
हरेला त्यार मानते रया,
जी रया जागी रया.

जी रया, जागि रया का अर्थ

जी रया, जागि रया का अर्थ है, तुम जीते रहो और जागरूक बने रहो, हरेले का यह दिन-बार आता-जाता रहे, वंश-परिवार दुब की तरह पनपता रहे, धरती जैसा विस्तार मिले आकाश की तरह उच्चता प्राप्त हो, सिंह जैसी ताकत और सियार जैसी बुद्धि मिले, हिमालय में हिम के रहने और गंगा-जमुना में पानी बहने तक, हरेले का त्यौहार मानते रहो, तुम जीते रहो और जागरूक बने रहो.”

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हरेले का वैज्ञानिक महत्व

अगर हम हरेले लोकपर्व का ध्यान से अध्ययन करें तो हमें ये पर्व लोक विज्ञान और जैव विविधता से जुड़ा दिखाई देगा। हरेला बोने और नौ-दस दिनों में उसके उगने की प्रक्रिया को एक तरह से बीजांकुरण परीक्षण के तौर पर देखा जा सकता है। इससे फसल के बारे में पहले ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस साल फसल कैसी होने वाली है।

हरेले में जो मिश्रित बीजों को बोने की परम्परा है, वो मिश्रित खेती की पद्धति के महत्व को साफ साफ दर्शाती है। परिवार और समाज में एक दूसरे की भागीदारी से मनाए जाने वाला ये लोक पर्व एकता का भी प्रतीक है, क्योंकि उत्तराखंड में संयुक्त परिवार चाहे कितना भी बड़ा हो, पर हरेला एक ही जगह पर बोया जाता है। कहीं-कहीं पूरे गांव का हरेला सामूहिक रूप से एक ही जगह, ज्यादातर गांव के मंदिर में बोया जाता है। 

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यात्रागाइड

हरेले का उत्तराखंड वासियों से जुड़ाव

उत्तराखंड में हरेले की इतनी महत्वता है कि अगर परिवार का कोई भी सदस्य घर से बाहर रहता है, तो उनके पास हरेला डाक के माध्यम से भिजवाया जाता है. उत्तराखंड की संस्कृति में युवाओं और बुजुर्गों को जोड़ने वाला हरेला पर्व संस्कृति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है और कुछ लोग इस दिन वृक्षारोपण कर पेड़ पौंधों को संरक्षित करने का संदेश देते हैं

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